हमें खुशी है कि आज हमारा गणराज्य इकसठ वे वर्ष का लोकतांत्रिक संप्रभु राष्ट्र कहलायेगा ।परन्तु क्या हमने साठेतर परिपक्वता प्राप्त कर ली है या सिर्फ धूप में ही अपने बाल सफेद कर लिये है ।क्या साठेतर गणतंत्र का पाठ जो हमने अब तक लिखा है और आगे लिख रहे है वह हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए शिक्षाप्रद होगा ,या वह हमे स्थिति को इस हद तक बिगाडने और बिगड़ जाने देने के लिए कोसेगी, दोषी ठहरायेगी । 26 जनवरी 1950 को जब भारत का संविधान लागू हुआ ,तब अनैको चुनौतियां हमारे सामने थी और हम राष्ट्रप्रेम के उत्साह से भरे हुए थे गांधीजी को खो देने के बावजूद गांधीजी का ग्राम और स्वदेशी आधारित अत्यंत व्यवहारिक दशर्न हमारे मार्गदशर्न के लिए अनमोल खजाने के रूप में हमे उपलब्ध था । हम कर्ज से मुक्त और संपदा से युक्त एक राष्ट्र थे । हम समूचे विश्व को नयी राह दिखाने की क्षमता वाले सक्षम राष्ट्र थे, परन्तु पता नही, क्या हुआ ,क्यो हुआ । जैसे मेरा देश नजरा गया,उसके बाद जो कुछ भी हुआ और होता रहा है वह देश के हित में कम नेताओ के उनके वंशजो के बाबू अधिकारियो के और पूंजीपतियो के हित मे अधिक हुआ । लाखो करोड़ो रूपये देश की पंचवर्षीय योजनाओं की भेट़ च़ढ़ गये,देश का तो जो विकास होना था सो हुआ या नहीं न तो किसी को इसका ठीक ठीक पता है न ही किसी को यह सब देखने में रूची है । हां नेताओ की पंचवर्षीय योजनाएं अच्छी तरह से मनती चली गई है और उनका भारी भारी विकास होता चला गया है । कहा जाता है कि 'भारत गरीबों का देश है, मगर यहां दुनिया के बड़े अमीर बसते हैं।' काफी गुजारिश के बाद स्विस बैंक असोसिएशन ने इस बात का खुलासा किया है कि उसके बैंकों में किस देश के लोगों का कितना धन जमा है। इसमें भारतीयों ने बाजी मारी है। इस मामले में भारतीय अव्वल हैं। भारतीयों के कुल 65,223 अरब रुपये जमा है, दूसरे नंबर पर रूस है जिनके लोगों के करीब 21,235 अरब रुपये जमा है। हमारा पड़ोसी चीन पांचवें स्थान हैं, उसके मात्र 2154 अरब रुपये जमा है। तकनीकी रूप से वह हमारे जीडीपी का 6 गुना है , इतने धन से भारत की तस्वीर बदली जा सकती है।काफी हद तक गरीबी दूर की जा सकती है। परन्तु पिछले दिनों विदेशी बैंकों में जमा काले धन के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जब सरकार से पूछा गया कि आखिर वह विदेशी बैंकों में भारतीय खातेदारों के नाम को क्यों नहीं उजागर करना चाहती है तो सरकार का जवाब हैरान कर देने वाला रहा। कोई ठोस उत्तर देने की बजाय वह ज्ञान बांटती नजर आई कि अगर नामों का खुलासा हुआ तो अंतरराष्ट्रीय संधि का उल्लंघन होगा और इससे भारत की छवि को भी धक्का पहुंचेगा। वाशिंगटन स्थित ग्लोबल फिनांशल इंटीग्रिटी (जीएफआई) द्वारा से अवैध वित्त प्रवाह के कारक : 1948-2008 शीर्षक से जारी रिपोर्ट में पाया गया कि 1991 में शुरू किए गए आर्थिक सुधार के बाद से आर्थिक वृद्धि दर में तेजी आने से आय वितरण में गिरावट आई, जिससे भारत से अवैध धन बाहर गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, ये अवैध धन प्रवाह मुख्यतौर पर कर चोरी, भ्रष्टाचार, घूस और आपराधिक गतिविधियों के परिणाम स्वरूप हुआ। रिपोर्ट में कहा गया है, भारत का कुल अवैध वित्तीय प्रवाह का वर्तमान मूल्य कम से कम 462 अरब डॉलर है। यह अल्पकालिक अमेरिकी ट्रेजरी बिल पर आधारित है। इस तरह से कुल अवैध धन प्रवाह भारत पर विदेशीकर्ज के मुकाबले दोगुने से अधिक है। भारत पर विदेशी कर्ज 230 अरब डालर के करीब है।
जीएफआई के निदेशक रेमंड बेकर ने कहा, इस रपट से पता चलता है कि भारत से अवैध धन प्रवाह के चलते देश में गरीबी का स्तर तेजी से बढ़ा है और भारत के गरीब और अमीर के बीच खाई बढ़ी है।
इसका अर्थ यह है कि यह धन आम जनता की गरीबी दूर करने के लिए नही है , बल्कि यही धन आम जनता से छीनकर उन्हे गरीब किया गया है ,इस देश को कर्जदार बनाया गया है ।और भारी विषमता की इस खाई को रचा गया है । एक वक्त था कि देश उतमर्ण था । उसके बाद छदम विकास के नाम पर कर्ज लेकर घी पीने की संस्कृति का अनुसरण किया गया ,जिसके अर्न्तगत देश ने कर्ज लिया और नेताओ बाबूओ अधिकारियो ने उसका घी पिया ।और उससे होने वाले भारी भारी घाटो को पाटने के लिए जनता पर टेक्स पर टेक्स लगाये गये ।कीमतो में लगातार बेंतहाशा वृद्धि की गई और फिर कर्ज और मंहगाई को आसमान की उंचाईयो तक पहुंचा दिया गया ।विषमताओ की खाई इतनी गहरी और चौड़ी हो गई कि घबराकर हजारो लोगो ने आत्महत्याएं कर ली और यह सिलसिला आज भी बददस्तूर जारी है । नेताओ को उसकी रतीभर भी परवाह या चिंता नही है । बकोल धूमिल भुक्खड जब गुस्सा करेगा अपनी ही उंगलिया चबायेगा॥
भ्रटाचार का सिलसिला प्रारंभ मे तो आटे में नमक के समान था ,उसके बाद नमक आटा आधा आधा हो गया ,और आज तो स्थिति यह हो गई है कि अब नमक में आटा मिलाया जाता है ,वह भी इसलिए ताकि यह सनद रहे कि हमने आटा भी डाला है । अब क्या कितना है इसका निसपक्ष फैसला करने के लिए कोई नही है ।न किसी की ताकत है कि इतना नमक हजम कर चुके महाबलियों पर उंगली उठा सके।न कोई ऐसी हिमाकत करता है । और जो मूर्ख यह भूल करता भी है उसे या तो शहीद होना पडता है या उसकी हालत ऐसी कर दी जाती है कि वह अपनी किस्मत पर रोता है कि उसने ऐसा क्यो किया । क्योकि किसी ने सच ही कहा है कि ॔शरीक ए जुल्म यहां हर किसी का चेहरा है ,किसका इंसाफ किससे कराया जाये’’ ? चाहे राष्ट्र के विकास का प्रश्न हो चाहे उदारीकरण और बाजारवाद की नीति को अपनाने का प्रश्न हो ,एक एक नीति ,एक एक कदम सभी के पीछे सभी अंतरग निहितार्थो से भ्रष्टाचार की मजबूत डोर जुडी हुई है । अर्थ के इस भ्रष्ट और गंदे खेल में हमारा गणतंत्र केवल झंडा फहराकर जनगणमन अधिनायक जय है जय है जय है गाने के लिए विवश और लाचार है । जनगण विवशताभरी डबडबाई आंखों से सब देखभर सकता है चिकन की दुकान के दडबे में बंद मुर्गे की तरह , बस । हर वर्ष हमारे गणतंत्र की क्लास के ब्लेकबोर्ड पर पुराना वर्ष मिटाकर नया वर्ष डाल दिया जाता है । स्कूल के ग्राउंड से लेकर लाल किले तक झंडावंदन हो जाता है । मेरे देश की धरती एवं ऐ मेरे वतन के लोगो का रेकार्ड बजा दिया जाता है बच्चे तालिया बजाते है और नुक्ती के प्रसाद का वितरण हो जाता है ।इसके बाद फिर से नेता और अधिकारी मिलकर नयी योजनाओ के साथ नयी उर्जा से भरकर आपसी भाईचारे के साथ तनमन से जनगण को लूटने में लग जाते है ।
विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्रपति का शपथविधि समारोह भी इतना सादगीभरा होता है कि अगर वे हमारे पार्षद के चुनाव का भी नजारा देख ले तो शरमा जाए ।हमारे गणतंत्र दिवस के एश्वर्यशाली समारोह ,व हमारे राष्ट्रपति जो मात्र रबर स्टाम्प होते है उनकी शान और शौकत देखकर विश्वभर के मेहमानो को भी लगता है कि भारत भी कोई गरीब नही वरन महासम्पन्न विकसित देश है । राजामहाराजाओं को तो नेताओ ने ठिकाने लगा दिया है परन्तु हमारे नेताओ ने उनके एश्वर्य को भी पीछे छोड़ दिया है ।किसी बड़े से बड़े राजा महाराजा ने भी अपने राज्य के स्वर्णकाल में भी ऐसा एश्वर्य देखा और भोगा नही होगा जो हमारे गणतंत्र में हमारे ये सेवक भोग रहे है ।और गण की स्थिति तो ठगे हुए और लुटे हुए शख्स की तरह हो गई ।धूमिल ने हमारे गण की स्थिति की व्याख्या करते हुये लिखा है कि जनता क्या है ? एक शब्द ....सिर्फ एक शब्द कुहरा ,कीचड़ और कांच से बना हुआ ,वह एक भेड़ है जो दूसरो की ठंड के लिए अपनी पीठ पर उन की फसल ढ़ो रही है । परन्तु क्या अब समय नही आ गया है कि गण को तंत्र से जोड़ा जाए । और तंत्र को गण की सच्ची देखभाल करने के लिए विवश किया जाए । हमारे नेताओ को अटलजी की संसद में दी गई सीख याद दिलाई जाए कि आखिर एक व्यक्ति को कितना पैसा चाहिए ,उसकी कोई तो सीमा होना चाहिए । यह तो तय है कि वह व्यक्ति स्वयं तो अपने इस असीमित काले धन का कोई उपभोग नही कर पायेगा ।किसी दिन स्वीस बैंक में ही यह धन रह जाएगा या फिर चौराहे पर ही उनके पाप का भंड़ाफोड़ हो जायेगा या फिर कुते खीर खायेगे।
रिपोर्ट के मुताबिक, ये अवैध धन प्रवाह मुख्यतौर पर कर चोरी, भ्रष्टाचार, घूस और आपराधिक गतिविधियों के परिणाम स्वरूप हुआ। रिपोर्ट में कहा गया है, भारत का कुल अवैध वित्तीय प्रवाह का वर्तमान मूल्य कम से कम 462 अरब डॉलर है। यह अल्पकालिक अमेरिकी ट्रेजरी बिल पर आधारित है। इस तरह से कुल अवैध धन प्रवाह भारत पर विदेशीकर्ज के मुकाबले दोगुने से अधिक है। भारत पर विदेशी कर्ज 230 अरब डालर के करीब है।
जीएफआई के निदेशक रेमंड बेकर ने कहा, इस रपट से पता चलता है कि भारत से अवैध धन प्रवाह के चलते देश में गरीबी का स्तर तेजी से बढ़ा है और भारत के गरीब और अमीर के बीच खाई बढ़ी है।
इसका अर्थ यह है कि यह धन आम जनता की गरीबी दूर करने के लिए नही है , बल्कि यही धन आम जनता से छीनकर उन्हे गरीब किया गया है ,इस देश को कर्जदार बनाया गया है ।और भारी विषमता की इस खाई को रचा गया है । एक वक्त था कि देश उतमर्ण था । उसके बाद छदम विकास के नाम पर कर्ज लेकर घी पीने की संस्कृति का अनुसरण किया गया ,जिसके अर्न्तगत देश ने कर्ज लिया और नेताओ बाबूओ अधिकारियो ने उसका घी पिया ।और उससे होने वाले भारी भारी घाटो को पाटने के लिए जनता पर टेक्स पर टेक्स लगाये गये ।कीमतो में लगातार बेंतहाशा वृद्धि की गई और फिर कर्ज और मंहगाई को आसमान की उंचाईयो तक पहुंचा दिया गया ।विषमताओ की खाई इतनी गहरी और चौड़ी हो गई कि घबराकर हजारो लोगो ने आत्महत्याएं कर ली और यह सिलसिला आज भी बददस्तूर जारी है । नेताओ को उसकी रतीभर भी परवाह या चिंता नही है । बकोल धूमिल भुक्खड जब गुस्सा करेगा अपनी ही उंगलिया चबायेगा॥
भ्रटाचार का सिलसिला प्रारंभ मे तो आटे में नमक के समान था ,उसके बाद नमक आटा आधा आधा हो गया ,और आज तो स्थिति यह हो गई है कि अब नमक में आटा मिलाया जाता है ,वह भी इसलिए ताकि यह सनद रहे कि हमने आटा भी डाला है । अब क्या कितना है इसका निसपक्ष फैसला करने के लिए कोई नही है ।न किसी की ताकत है कि इतना नमक हजम कर चुके महाबलियों पर उंगली उठा सके।न कोई ऐसी हिमाकत करता है । और जो मूर्ख यह भूल करता भी है उसे या तो शहीद होना पडता है या उसकी हालत ऐसी कर दी जाती है कि वह अपनी किस्मत पर रोता है कि उसने ऐसा क्यो किया । क्योकि किसी ने सच ही कहा है कि ॔शरीक ए जुल्म यहां हर किसी का चेहरा है ,किसका इंसाफ किससे कराया जाये’’ ? चाहे राष्ट्र के विकास का प्रश्न हो चाहे उदारीकरण और बाजारवाद की नीति को अपनाने का प्रश्न हो ,एक एक नीति ,एक एक कदम सभी के पीछे सभी अंतरग निहितार्थो से भ्रष्टाचार की मजबूत डोर जुडी हुई है । अर्थ के इस भ्रष्ट और गंदे खेल में हमारा गणतंत्र केवल झंडा फहराकर जनगणमन अधिनायक जय है जय है जय है गाने के लिए विवश और लाचार है । जनगण विवशताभरी डबडबाई आंखों से सब देखभर सकता है चिकन की दुकान के दडबे में बंद मुर्गे की तरह , बस । हर वर्ष हमारे गणतंत्र की क्लास के ब्लेकबोर्ड पर पुराना वर्ष मिटाकर नया वर्ष डाल दिया जाता है । स्कूल के ग्राउंड से लेकर लाल किले तक झंडावंदन हो जाता है । मेरे देश की धरती एवं ऐ मेरे वतन के लोगो का रेकार्ड बजा दिया जाता है बच्चे तालिया बजाते है और नुक्ती के प्रसाद का वितरण हो जाता है ।इसके बाद फिर से नेता और अधिकारी मिलकर नयी योजनाओ के साथ नयी उर्जा से भरकर आपसी भाईचारे के साथ तनमन से जनगण को लूटने में लग जाते है ।
विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्रपति का शपथविधि समारोह भी इतना सादगीभरा होता है कि अगर वे हमारे पार्षद के चुनाव का भी नजारा देख ले तो शरमा जाए ।हमारे गणतंत्र दिवस के एश्वर्यशाली समारोह ,व हमारे राष्ट्रपति जो मात्र रबर स्टाम्प होते है उनकी शान और शौकत देखकर विश्वभर के मेहमानो को भी लगता है कि भारत भी कोई गरीब नही वरन महासम्पन्न विकसित देश है । राजामहाराजाओं को तो नेताओ ने ठिकाने लगा दिया है परन्तु हमारे नेताओ ने उनके एश्वर्य को भी पीछे छोड़ दिया है ।किसी बड़े से बड़े राजा महाराजा ने भी अपने राज्य के स्वर्णकाल में भी ऐसा एश्वर्य देखा और भोगा नही होगा जो हमारे गणतंत्र में हमारे ये सेवक भोग रहे है ।और गण की स्थिति तो ठगे हुए और लुटे हुए शख्स की तरह हो गई ।धूमिल ने हमारे गण की स्थिति की व्याख्या करते हुये लिखा है कि जनता क्या है ? एक शब्द ....सिर्फ एक शब्द कुहरा ,कीचड़ और कांच से बना हुआ ,वह एक भेड़ है जो दूसरो की ठंड के लिए अपनी पीठ पर उन की फसल ढ़ो रही है । परन्तु क्या अब समय नही आ गया है कि गण को तंत्र से जोड़ा जाए । और तंत्र को गण की सच्ची देखभाल करने के लिए विवश किया जाए । हमारे नेताओ को अटलजी की संसद में दी गई सीख याद दिलाई जाए कि आखिर एक व्यक्ति को कितना पैसा चाहिए ,उसकी कोई तो सीमा होना चाहिए । यह तो तय है कि वह व्यक्ति स्वयं तो अपने इस असीमित काले धन का कोई उपभोग नही कर पायेगा ।किसी दिन स्वीस बैंक में ही यह धन रह जाएगा या फिर चौराहे पर ही उनके पाप का भंड़ाफोड़ हो जायेगा या फिर कुते खीर खायेगे।





