लोकप्रिय पोस्ट

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

आटे में नमक या नमक में आटा

हमें खुशी है कि आज हमारा गणराज्य इकसठ वे वर्ष का लोकतांत्रिक संप्रभु राष्ट्र कहलायेगा ।परन्तु क्या हमने साठेतर परिपक्वता प्राप्त कर ली है या सिर्फ धूप में ही अपने बाल सफेद कर लिये है ।क्या साठेतर गणतंत्र का पाठ जो हमने अब तक लिखा है और आगे लिख रहे है वह हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए शिक्षाप्रद होगा ,या वह हमे स्थिति को इस हद तक बिगाडने और बिगड़ जाने देने के लिए कोसेगी, दोषी ठहरायेगी । 26 जनवरी 1950 को जब भारत का संविधान लागू हुआ ,तब अनैको चुनौतियां हमारे सामने थी और हम राष्ट्रप्रेम के उत्साह से भरे हुए थे गांधीजी को खो देने के बावजूद गांधीजी का ग्राम और स्वदेशी आधारित अत्यंत व्यवहारिक दशर्न हमारे मार्गदशर्न के लिए अनमोल खजाने के रूप में हमे उपलब्ध था । हम कर्ज से मुक्त और संपदा से युक्त एक राष्ट्र थे । हम समूचे विश्व को नयी राह दिखाने की क्षमता वाले सक्षम राष्ट्र थे, परन्तु पता नही, क्या हुआ ,क्यो हुआ । जैसे मेरा देश नजरा गया,उसके बाद जो कुछ भी हुआ और होता रहा है वह देश के हित में कम नेताओ के उनके वंशजो के बाबू अधिकारियो के और पूंजीपतियो के हित मे अधिक हुआ । लाखो करोड़ो रूपये देश की पंचवर्षीय योजनाओं की भेट़ च़ढ़ गये,देश का तो जो विकास होना था सो हुआ या नहीं न तो किसी को इसका ठीक ठीक पता है न ही किसी को यह सब देखने में रूची है । हां नेताओ की पंचवर्षीय योजनाएं अच्छी तरह से मनती चली गई है और उनका भारी भारी विकास होता चला गया है । कहा जाता है कि 'भारत गरीबों का देश है, मगर यहां दुनिया के बड़े अमीर बसते हैं।' काफी गुजारिश के बाद स्विस बैंक असोसिएशन ने इस बात का खुलासा किया है कि उसके बैंकों में किस देश के लोगों का कितना धन जमा है। इसमें भारतीयों ने बाजी मारी है। इस मामले में भारतीय अव्वल हैं। भारतीयों के कुल 65,223 अरब रुपये जमा है, दूसरे नंबर पर रूस है जिनके लोगों के करीब 21,235 अरब रुपये जमा है। हमारा पड़ोसी चीन पांचवें स्थान हैं, उसके मात्र 2154 अरब रुपये जमा है। तकनीकी रूप से वह हमारे जीडीपी का 6 गुना है , इतने धन से भारत की तस्वीर बदली जा सकती है।काफी हद तक गरीबी दूर की जा सकती है। परन्तु पिछले दिनों विदेशी बैंकों में जमा काले धन के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जब सरकार से पूछा गया कि आखिर वह विदेशी बैंकों में भारतीय खातेदारों के नाम को क्यों नहीं उजागर करना चाहती है तो सरकार का जवाब हैरान कर देने वाला रहा। कोई ठोस उत्तर देने की बजाय वह ज्ञान बांटती नजर आई कि अगर नामों का खुलासा हुआ तो अंतरराष्ट्रीय संधि का उल्लंघन होगा और इससे भारत की छवि को भी धक्का पहुंचेगा। वाशिंगटन स्थित ग्लोबल फिनांशल इंटीग्रिटी (जीएफआई) द्वारा से अवैध वित्त प्रवाह के कारक : 1948-2008 शीर्षक से जारी रिपोर्ट में पाया गया कि 1991 में शुरू किए गए आर्थिक सुधार के बाद से आर्थिक वृद्धि दर में तेजी आने से आय वितरण में गिरावट आई, जिससे भारत से अवैध धन बाहर गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, ये अवैध धन प्रवाह मुख्यतौर पर कर चोरी, भ्रष्टाचार, घूस और आपराधिक गतिविधियों के परिणाम स्वरूप हुआ। रिपोर्ट में कहा गया है, भारत का कुल अवैध वित्तीय प्रवाह का वर्तमान मूल्य कम से कम 462 अरब डॉलर है। यह अल्पकालिक अमेरिकी ट्रेजरी बिल पर आधारित है। इस तरह से कुल अवैध धन प्रवाह भारत पर विदेशीकर्ज के मुकाबले दोगुने से अधिक है। भारत पर विदेशी कर्ज 230 अरब डालर के करीब है।
जीएफआई के निदेशक रेमंड बेकर ने कहा, इस रपट से पता चलता है कि भारत से अवैध धन प्रवाह के चलते देश में गरीबी का स्तर तेजी से बढ़ा है और भारत के गरीब और अमीर के बीच खाई बढ़ी है।
इसका अर्थ यह है कि यह धन आम जनता की गरीबी दूर करने के लिए नही है , बल्कि यही धन आम जनता से छीनकर उन्हे गरीब किया गया है ,इस देश को कर्जदार बनाया गया है ।और भारी विषमता की इस खाई को रचा गया है । एक वक्त था कि देश उतमर्ण था । उसके बाद छदम विकास के नाम पर कर्ज लेकर घी पीने की संस्कृति का अनुसरण किया गया ,जिसके अर्न्तगत देश ने कर्ज लिया और नेताओ बाबूओ अधिकारियो ने उसका घी पिया ।और उससे होने वाले भारी भारी घाटो को पाटने के लिए जनता पर टेक्स पर टेक्स लगाये गये ।कीमतो में लगातार बेंतहाशा वृद्धि की गई और फिर कर्ज और मंहगाई को आसमान की उंचाईयो तक पहुंचा दिया गया ।विषमताओ की खाई इतनी गहरी और चौड़ी हो गई कि घबराकर हजारो लोगो ने आत्महत्याएं कर ली और यह सिलसिला आज भी बददस्तूर जारी है । नेताओ को उसकी रतीभर भी परवाह या चिंता नही है । बकोल धूमिल भुक्खड जब गुस्सा करेगा अपनी ही उंगलिया चबायेगा॥
भ्रटाचार का सिलसिला प्रारंभ मे तो आटे में नमक के समान था ,उसके बाद नमक आटा आधा आधा हो गया ,और आज तो स्थिति यह हो गई है कि अब नमक में आटा मिलाया जाता है ,वह भी इसलिए ताकि यह सनद रहे कि हमने आटा भी डाला है । अब क्या कितना है इसका निसपक्ष फैसला करने के लिए कोई नही है ।न किसी की ताकत है कि इतना नमक हजम कर चुके महाबलियों पर उंगली उठा सके।न कोई ऐसी हिमाकत करता है । और जो मूर्ख यह भूल करता भी है उसे या तो शहीद होना पडता है या उसकी हालत ऐसी कर दी जाती है कि वह अपनी किस्मत पर रोता है कि उसने ऐसा क्यो किया । क्योकि किसी ने सच ही कहा है कि ॔शरीक ए जुल्म यहां हर किसी का चेहरा है ,किसका इंसाफ किससे कराया जाये’’ ? चाहे राष्ट्र के विकास का प्रश्न हो चाहे उदारीकरण और बाजारवाद की नीति को अपनाने का प्रश्न हो ,एक एक नीति ,एक एक कदम सभी के पीछे सभी अंतरग निहितार्थो से भ्रष्टाचार की मजबूत डोर जुडी हुई है । अर्थ के इस भ्रष्ट और गंदे खेल में हमारा गणतंत्र केवल झंडा फहराकर जनगणमन अधिनायक जय है जय है जय है गाने के लिए विवश और लाचार है । जनगण विवशताभरी डबडबाई आंखों से सब देखभर सकता है चिकन की दुकान के दडबे में बंद मुर्गे की तरह , बस । हर वर्ष हमारे गणतंत्र की क्लास के ब्लेकबोर्ड पर पुराना वर्ष मिटाकर नया वर्ष डाल दिया जाता है । स्कूल के ग्राउंड से लेकर लाल किले तक झंडावंदन हो जाता है । मेरे देश की धरती एवं ऐ मेरे वतन के लोगो का रेकार्ड बजा दिया जाता है बच्चे तालिया बजाते है और नुक्ती के प्रसाद का वितरण हो जाता है ।इसके बाद फिर से नेता और अधिकारी मिलकर नयी योजनाओ के साथ नयी उर्जा से भरकर आपसी भाईचारे के साथ तनमन से जनगण को लूटने में लग जाते है ।
विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्रपति का शपथविधि समारोह भी इतना सादगीभरा होता है कि अगर वे हमारे पार्षद के चुनाव का भी नजारा देख ले तो शरमा जाए ।हमारे गणतंत्र दिवस के एश्वर्यशाली समारोह ,व हमारे राष्ट्रपति जो मात्र रबर स्टाम्प होते है उनकी शान और शौकत देखकर विश्वभर के मेहमानो को भी लगता है कि भारत भी कोई गरीब नही वरन महासम्पन्न विकसित देश है । राजामहाराजाओं को तो नेताओ ने ठिकाने लगा दिया है परन्तु हमारे नेताओ ने उनके एश्वर्य को भी पीछे छोड़ दिया है ।किसी बड़े से बड़े राजा महाराजा ने भी अपने राज्य के स्वर्णकाल में भी ऐसा एश्वर्य देखा और भोगा नही होगा जो हमारे गणतंत्र में हमारे ये सेवक भोग रहे है ।और गण की स्थिति तो ठगे हुए और लुटे हुए शख्स की तरह हो गई ।धूमिल ने हमारे गण की स्थिति की व्याख्या करते हुये लिखा है कि जनता क्या है ? एक शब्द ....सिर्फ एक शब्द कुहरा ,कीचड़ और कांच से बना हुआ ,वह एक भेड़ है जो दूसरो की ठंड के लिए अपनी पीठ पर उन की फसल ढ़ो रही है । परन्तु क्या अब समय नही आ गया है कि गण को तंत्र से जोड़ा जाए । और तंत्र को गण की सच्ची देखभाल करने के लिए विवश किया जाए । हमारे नेताओ को अटलजी की संसद में दी गई सीख याद दिलाई जाए कि आखिर एक व्यक्ति को कितना पैसा चाहिए ,उसकी कोई तो सीमा होना चाहिए । यह तो तय है कि वह व्यक्ति स्वयं तो अपने इस असीमित काले धन का कोई उपभोग नही कर पायेगा ।किसी दिन स्वीस बैंक में ही यह धन रह जाएगा या फिर चौराहे पर ही उनके पाप का भंड़ाफोड़ हो जायेगा या फिर कुते खीर खायेगे।

करोडों का "गनतंत्र" या जनता का गणतंत्र ...

करोडों का "गनतंत्र" या जनता का गणतंत्र ...


जगह-जगह ए के-४७ जैसी घातक बंदूकों के साथ रास्ता रोककर तलाशी लेते दिल्ली पुलिस के सिपाही, सड़कों पर दिन-रात गश्त लगाते कमांडो, रात भर कानफोडू आवाज़ के साथ सड़कों पर दौड़ती पुलिस की गाडियां, फौजी वर्दी में पहरा देते अर्ध-सैनिक बलों के पहरेदार, होटलों और गेस्ट-हाउसों में घुसकर चलता तलाशी अभियान और पखवाड़े भर पहले से अख़बारों-न्यूज़ चैनलों और दीवारों पर चिपके पोस्टरों के माध्यम से आतंकवादी हमले की चेतावनी देती सरकार.....ऐसा नहीं लग रहा जैसे देश पर किसी दुश्मन राष्ट्र की नापाक निगाहें पड गई हों लेकिन घबराइए मत क्योंकि न तो दुश्मन ने हमला किया है और न ही देश किसी मुसीबत में है बल्कि यह तो हमारे राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस पर की जा रही तैयारियां हैं. गणतंत्र यानी जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा....इसीतरह गणतंत्र दिवस अर्थात जनता का राष्ट्रीय पर्व पर क्या आम जनता अपने इस राष्ट्रीय त्यौहार को उतने ही उत्साह के साथ मना पाती है जितने उत्साह से देश में होली,दिवाली और ईद जैसे धार्मिक-सामाजिक पर्व मनाये जाते हैं? राष्ट्रीय पर्व को उत्साह से मनाना तो दूर उलटे जनता से अपेक्षा की जाती है कि वह इस दिन आपने घर से ही न निकले और यदि देश भर से कुछ हज़ार लोग इस राष्ट्रीय पर्व का आनंद उठाने के लिए सड़कों पर निकलते हैं तो उन्हें बंद रास्तों, छावनी बनी दिल्ली और दिल तोड़ देने वाली पुलिसिया तलाशी से इतना परेशान होना पड़ता है कि भविष्य में वे भी तौबा करना ही उचित समझते हैं. असलियत में देखा जाये तो धार्मिक-सामाजिक उत्सवों की हमारे देश में कोई कमी नहीं है जबकि राष्ट्रीय पर्व महज गिनती के हैं.वैसे भी गणतंत्र दिवस का अपना अलग ही महत्त्व है. इस साल भी देश एक बार फिर अपनी आज़ादी और उसके बाद हुए व्यवस्था परिवर्तन की खुशियाँ मनाने की तैयारियों में जुटा है.गणतंत्र दिवस के अवसर पर होने वाले इस सालाना जलसे में चकाचक राजपथ पर देश भर से आये कलाकार, सैनिक और स्कूली बच्चे अपनी कला के रंग बिखेरेंगे और सरहदों की हिफाज़त करने वाली सेनाओं के जवान अपनी ताक़त,अस्त्र-शस्त्रों और जोश के जरिये एक बार फिर हमें इस बात का विश्वास दिलाएंगे की हम और हमारी सरहद उनके हाथो में पूरी तरह सुरक्षित है.करोड़ो रुपये में होने वाले इस जलसे का उत्साह मीडिया में तो खूब नज़र आता है क्योंकि विज्ञापनों से पन्ने भरे रहते हैं, गणतंत्र दिवस की तैयारियों की खबरों से पन्ने रंग जाते हैं परन्तु आम जनता जिसके लिए यह सारा ताम-झाम होता है वह इससे महरूम ही रह जाती है. बस उसे अखबार पढ़कर और न्यूज़ चैनलों के चीखते-चिल्लाते और डराने का प्रयास करते एंकरों के जरिये इस आयोजन में भागीदारी निभानी पड़ती है. अब तो टीवी पर बढ़ती चैनलों की भीड़ ने लोगों को घर पर भी परेड का मज़ा लेने की बजाये इस दिन आने वाले मनोरंजक कार्यक्रमों और छोटे परदे पर बड़ी फिल्मों को देखने का लालच देना शुरू कर दिया है इसलिए घर बैठकर राष्ट्रीय पर्व मनाने की परंपरा दम तोड़ने लगी है.ऐसा न हो कि इस लापरवाही के चलते हमारा यह सबसे बड़ा आयोजन अपनी गरिमा खोकर सरकारी औपचारिकता बनकर रह जाए और भविष्य की पीढ़ी को इस आयोजन के लिए वीडियो देखकर ही काम चलाना पड़े...?


                                                                                                                             संजीव शर्मा 

रविवार, 9 जनवरी 2011

सामाजिक संगठन के साथी ऑनलाइन धोखे से बचे.....................


इन्टरनेट कि दुनिया ने  सारे काम आसन कर के रख दिया है पुरी दुनिया को एक मुठ्ठी में बंद कर दिया है. एक क्लिक पर आप दुनिया के किसी भी कोने के जानकारी प्राप्त कर सकते है इन्टरनेट से सरे काम आसन हो गये है परन्तु कही कही यही इन्टरनेट आपको ठगने का काम भी कर लेता है ऑनलाइन डोनेसन और वर्कशॉप के नाम पे आपके गाड़ी कमी को ठगने का काम भी हो रहा  है. इसलिए ऐसे स्पं से सावधान रहने कि आवस्यकता है. आये जानते है कि ये धोखे बाज काम कैसे करते है ....................
  1.  सबसे पहले आपकी ईमेल      I D   का पता  कही से लगा  लेते है    फिर ये आपको मेल भेजते है मोस्टली इनके निशाने पर छोटे या माध्यम श्रेणी के सामाजिक संगठन होते है इनके मेल में लिखा होता है कि आपकी संस्था को हमारी संस्था द्वारा $२००००- या ऐसी ही कुछ राशी डोनेट किया जाना है भारत या ऐसे ही प्रगतिशील देशो के संस्थाओ को हम फंड  देते है यह पैसा आपको सामाजिक कार्यो में खर्च करना है . यह धन राशी आपको प्राप्त करने के लिए कुछ पंजीकरण राशी जमा करनी होगी यह राशी जमा करने से पहले ये संस्थाए बहुत ही तेज़ काम करती है पर इसके बाद इनका पता ही नहीं लगता है . 
  2.              दुसरे तरीके  में ये किसी बड़े कार्य क्रम का आयोजन दिखाते है और कहते है कि आप कि संस्था से एक या दो लोग इस कार्य क्रम में आमंत्रित है हवाई खर्च तथा रहने खाने का पूरा खर्च हमारा रहेगा इसके लिए आपको पहले पंजीकरण करना होगा जिसकी फीश मात्र $ २०० - या ऐसे ही होती है . फीश देने के बाद इन संस्थओ का पता नहीं लगता है.    
इस  तरह से हम समझ  सकते है कि यदि हमने किसी संस्थान को प्रोपोजल नहीं भेजा है तो फंड कहा से आ जायगा  हमें इस बात का हमेसा ध्यान रखना चाहिए तथा सभी नयी संस्थाओ के मेल पर पूरी जाच पड़ताल जरूरी है ...


                                                                                       विश्व वैभव शर्मा 
                                                                                       सेफ सोसाइटी
     साथी गोरखपुर द्वारा जनहित में जारी 



 

Information Alert for NGOs: Email scam offering sponsorship

Information Alert for NGOs: Email scam offering sponsorship

Recently, an email was circulated to many NGOs in Africa by someone claiming to be “Bridge Medical Research Foundation” inviting them to attend “the 4th International Workshop for Development and Finance” “scheduled from 14th to 19th February 2011 in Georgia-Atlanta, United States of America, (U.S.A).” The invitation attached to the email claimed to provide full sponsorship covering air travel and meals to at least 4 participants from each organization. But each participant had to pay US $285 as registration fee!
Some of the NGOs receiving this email cheered at the idea of receiving the sponsorship letter and were willing to pay the above sum immediately to participate in the workshop because they were getting an opportunity to visit the US of A. But one of our valued subscribers, Blair Henry from Botswana pointed out that there was something suspicious in this and alerted us to inform you all that this is nothing but a scam to cheat you! As soon as you transfer the registration fee (hard earned money of yours), the workshop organizers will disappear or may start demanding more money from you. So beware of such email scams.
But what makes one think that this is a scam? See the email below:
The name of the organization is not familiar, at least not in the development sector. So it is something that we need to investigate. On visiting its website, we find lot of information about the organization, but nothing about this so-called “International Workshop for Development and Finance.” This raises our suspicion.
Now we take a look at the invitation attached to the email:

The invitation says “your organization has been selected for sponsorship to the summit.” How come? When you have not sent any application or a request, how can your organization get selected for the sponsorship? Secondly, it is asking for a high registration fee of US $285 but it is offering to cover air travel and meals (not many reputable workshops and conferences do that). Thirdly, it is expecting participants to transfer this fee via Western Union to another country and not to the place where the event has to take place.
It is certain that this is nothing but a scam targeting NGOs to deceive them and take their money away. NGOs receiving such an email should best ignore it and inform other colleagues to not to fall for it.


                       

                                                                                      V.V.Sharma
                                                                   Kind support- Fund For NGO

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

Sachchi Seva

सच्ची सेवा नाम का ब्लॉग   सेफ सोसाइटी द्वारा संचालित किया जा रहा है इसके अंतर्गत नयी सुचना को प्रकाशित किया जाता है संस्थान द्वारा किये जा रहे प्रयास एवं कुछ अमूल्य जानकारी प्रदान कि जाती है  आप सभी से अनुरोध है कि आप इस तरह कि सुचना को हमें जरूर बताये आप द्वारा दी गयी सूचना आप के नाम से प्रकाशित कि जाएगी.........

और बच्चा गलत हाथो में जाने से बच गया .............................

                  आज जहाँ पुरी दुनिया विकसित होने  के रास्ते पे अग्रसर है तथा भारत इस दौड़ में सबसे तेज़ गति से दौड़ रहा है , किसी भी देश के विकास में  रीड की हड्डी बच्चे  ही होते है परन्तु भारत में अब भी कुछ बच्चे ऐसे है जो आज भी घरेलू उत्पीडन के डर से घर छोड़ के चले जा रहे  है. शायद उनको ये मालूम नहीं है कि जिस उत्पीडन के डर से वो घर छोड़ के जा रहे है वो ही उनका नसीब बन जाएगी और जिंदगी भर वो एक मात्र बधुआ मजदूर बनकर रह जायेंगे परन्तु यदि उनको इतना ज्ञान होता तो शायद वो ऐसा नहीं करते और अपने घर  पर ही रहते,  ऐसे ही घर की उत्पीडन से डर कर एक लड़के ने बड़ा कदम उठा लिया बिना सोचे  वह घर छोड़ कर चल दिया घटना महाराजगंज जनपद कि है .......
                    २ जनवरी  २०११  की रात ७.०० बजे होंगे कपकपाती ठंड रात बिना किसी बिशेष  काम के कोई बहार निकलना भी न चाहे ऐसे ठंडी रात में  एक १० बर्ष  का लड़का गोरखपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर ठंड से  ठिठुर रहा था. वह लाचार की तरह  इधुर - उधर घूम  रहा था उसको देख कर ऐसा लग रहा था जैसे की वह बहुत परेशान  हो  . उसको देख के लग रहा था की वह कही जाना चाह रहा हो लेकिन उसके साथ उसका  परिवार या कोई बैग नहीं था . ऐसी हालत में उस बच्चे पे एकाएक नजर सेफ सोसाइटी के निदेशक विश्व वैभव जी की पड़ी उसे देखते ही उनको कुछ अजीब लगा और कुछ देर के बाद वो उस बच्चे  के पास गये और उसका नाम पूछे इस पर वह घबडा गया ठंड से उसके पाव कापने लगे उसकी जबान काम नहीं कर रही थी डरते - डरते उसने कहा की उसका नाम गोविन्द कुशवाहा है .वह कक्षा ४ में पढता है . इतना कह कर वह रोने लगा उन्होंन उसे सहलाकर पूछा तो उसने बताया की वह आपनी माँ से नाराज है उसने उसको मारा है उसके दिल में माँ - पिता के लिए बहुत कस्ट थे दूसरी तरफ घबराहट भी थी . उसने बताया की उसकी माँ उसको बहुत मारती है तथा  घर के भी सभी काम करवाती है,  आज बिना किसी गलती के उसने मुघे मारा है. मै खेलना चाहता हू तो खेलने नहीं देती मेरी कोई बात नहीं मानी जाती है . इस प्रकार से बच्चे ने अपने पुरानी आपबीती सुनाई . उसने बताया  की उसके पिता राकेश माता चन्द्रावती देवी  है जो की महाराजगंज में रहते है .उसके परिवार में उसका एक बड़ा भाई एवं एक छोटा भाई तथा  एक छोटी बहन भी  है . उसके पिता एवं माता चूड़ी बेचकर किसी तरह से पूरे परिवार का भरण पोषण करते है . बच्चे के बारे में सारी जानकारी जुटाने के बाद सेफ सोसाइटी के विश्व वैभव जी ने बच्चो के सहयोग के लिए महाराजगंज जनपद  में काम करने वाली एक अग्रणी संस्थान नेहरु युवा ग्राम विकास युवा कल्याण सेवा संस्थान, महाराजगंज के लोगो से संपर्क किया संस्थान ने तुरंत इस बिंदु को गंभीरता से लिया तथा बताया कि आप बच्चे को तुरंत जी आर पी को सौप दे एवं बच्चे को भोजन कराकर सुला दे हम सुभाः तक इसके परिवार को खोज के गोरखपुर पंहुचा देंगे .इसके बाद बच्चे को जी  आर पी को सौप दिया गया . सुभाः के ९.०० बजे होंगे कि नेहरु संस्थान के लोगो ने उस परिवार को खोज निकाला बच्चे कि माँ का  रो रो के बुरा हाल हो गया था  उसके पिता हर जगह उसको खोज चुके थे पर अब  निराश  हो चुके  थे उसके भाई एवं बहन भी अपने प्यारे भाई के लिए मानों पागल सी हो गयी थी . लेकिन जब उन्हें यह जानकारी मिली तो वो खुसी से झूम उठे तथा नेहरु संस्थान के लोगो को इश्वर कि उपाधि देने लगे कहा कि आप मरे लिए साक्षात्  प्रभु बनकर आये है नहीं तो हम सब का क्या हाल होता हम अपने बच्चे के बिना मर जाते . 
                          इसके बाद बच्चे के पिता ने बयाया कि वो लोग मूलतः  ग्राम- गुन्पाई पोस्ट- बेल्तिकड़ थाना मख्ख्नपुर जनपद- फ्हिरोजाबाद उत्तर प्रदेश के रहने वाले है यहाँ चूड़ी बेचकर किसी तरह से परिवार का पालन पोषण करते है कल दिन में गोविन्द कि माँ ने उसको किसी बात पे डाट दिया जिससे नाराज होकर वह बिना कुछ बताये कही चला गया यह घटना दिन के १२.०० बजे कि है . इसके बाद संस्थान के लोगो ने बताया कि आप आपना प्रूफ ले जाकर बच्चे को वापस ले आये तथा बच्चो कि भावनाओ को समझे  तथा उसको प्यार व् दुलार से रखे उसकी माँ को भी हिदायत दी गयी शाम  तक उसके पिता बच्चे को लेकर वापस आ चुके थे उसका पूरा परिवार आपने भाई एवं बेटे को पाकर बहुत प्रस्सन था . आगले दिन संस्थान के निदेशक  साधू शरण  जी जाकर बच्चे का हाल चाल लिए तथा उसके परिवार को बच्चो को प्य्रेम से रखने कि कला बताए.एवं यह बचन भी लिए कि अब आगे से इस तरह कि घटना नहीं घेटेगी इसके लिए सभी प्रेम एवं सद्भाव से रहेंगे .
                         इस तरह से आज सेफ सोसाइटी एवं नेहरु संस्थान  के प्रयास से एक बच्चा गलत हाथो में जाने से बच गया नहीं तो यह संभव था कि यदि कुछ देर और बच्चे पर नजर नहीं पड़ी होती तो शायद  क्या होता ? 
                      संस्थान इस तरह के बच्चो के मदद के लिए एवं उनको उनके  परिवार में मिलाने के लिए कतिबाथ  है संस्थान  बच्चो को उनके परिवार में समुचित प्यार मिले एवं बच्चे खुश  रहे इसके लिए कार्य कर रही है . 


                                                                        प्रस्तुति- कु. हीना , गाजियाबाद


गुरुवार, 6 जनवरी 2011

एरे-गेरे राजनीती की दुकान सजाये बैठे है...........


एरे-गेरे राजनीती की दुकान सजाये बैठे है, जिसको देखो जहाँ-तहाँ पर जाम लगाये बैठे है. 


आरक्षण के मुद्दे पर बंधक बन गया राजस्थान, आना-जाना दूभर हो गया आमजन हुआ परेशान, 
रेल-पटरियों पर देखो गुर्जेर टेंट गढाए बैठे है, जिसको देखो जहाँ-तहाँ .................. 
कॉलेज... में गुट बने हुए है ऐसी पढाई होती है, जब देखो लात और घूंसे बिन बात लड़ाई  होती है,
अपना प्रभाव जमाने हेतु हड़ताल कराए बैठे है, जिसको देखो जहाँ-तहाँ............... 
आयकर की रेड पड़े तो व्यापारी कर दे हड़ताल, मिलावट के सेम्पल लेना बन गया अब जी का जंजाल, 
कही पे पुतले और कही पे टायर जलाये बैठे है, जिसको देखो जहाँ-तहाँ पर जाम लगाये बैठे है.


         


                                                                                                 विश्व वैभव शर्मा 

शनिवार, 1 जनवरी 2011

तेरे ही अंश से रची गयी हू

तेरे ही अंश से रची गयी हू
तेरे ही गर्भ मे, पली बड़ी
तेरी ही सांसो ने दिया है जीवन
तेरी ही बगिया की हू कली!

उसी गर्भ से एक और अंश
जब मेरे जीवन मे, आया
अपना सा ,प्यारा सा
नन्हा भाई मैने पाया!

फिर एक दिन अहसास हुआ
की अब मैं तुझे ना भाती हू
भाई तेरी आँखो का तारा
मैं एक बोझ कहलाती हू!

समय के पहले पहर मे,
भाई को स्नेह से जागती है
लाड करे तू ,जी से लगाए
दूध ,दही भी खिलती है!

मुझे तू फटकार लगाती है,
सारा काम कराती है ,
भाई करे कोई भी ग़लती
मुझे मार पड़ जाती है!


ला के देती नये खिलोने
नये कपड़े भी सीलवाती है
मेरे कपड़े फटे हुए है
“बाद मैं” कह के टाल जाती है!

आज तेरी मैं अपनी हू
कल किसी और घर जाना है
आ मुझे भी लाड कर
पल दो पल का साथ निभाना है!

बेटियो का साथ अधूरा
प्यार करने का समय है थोड़ा
फिर क्यो प्यार को तरस रही हू
मैं भी तो तेरी कोख जानी हू
 
 
                                                विश्व वैभव शर्मा 

Pani KI Khoj

               करोडो के तालाब खुदे , पानी का पता ही नहीं

        अमर उजाला टीम के व्यापक सर्वे में यह पता चला है कि तालाब तो काफी खुदे लेकिन उनमे पानी नहीं है . तालाब का काम एक सामान्य समझ की जरुरत मांगता है कि तालाब तो खुदे पर उसमे पानी कहा से आएगा . उसका रास्ता भी देखना होगा . सामान्यतया जो तालाब मनरेगा में खुदे है उनमे कात्च्मेंट का ध्यान नहीं रखा गया है उससे हो यह रहा है कि तालाब सूखे पड़े है   .                                    
केंद्र सरकार कि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् मनरेगा जैसी महत्वकांक्षी योजना को दुसरे चरण में शहरो में भी लागू करने के लिए बेताब दिख रही है , लेकिन इससे पहले चरण में जिस तरीके से काम हो रहा है उससे गाँव  में बड़े बदलाव कि उम्मीद बेमानी लग रही है . करोडो रूपये खर्च करके सैकड़ो पोखरे एवं तालाब खुदे लेकिन उसमे पानी भरने के लिए महीनो से बरसात का इंतजार हो रहा था .कारण कि मनरेगा में पानी भरने का बजट नहीं है. सड़के बनी पर गरीबो के रस्ते अब  भी कच्चे है . हां मजदूरो कि अहमियत जरूर बढ़ी है अब दुसरे जगह भी उन्हें डेढ़ सो  रूपये कि मजदूरी मिल जाती है . परन्तु साल भर काम न मिलने के कारण कोई खास बदलाव नहीं आया है .
        गोरखपुर से १५ कि मी की दुरी पर भौअपरगाव है यहाँ हरिजन बस्ती , शिव मंदिर और उत्तर टोला के पास के पोखरों पर  मनरेगा के लाखो  रूपये खर्च हुए है पर पानी नहीं भरा गया , शिव मंदिर के पास के प्राचीन पोखरा के लिए पूर्व सांसद राज नारायण पासी ने भी १०.६ लाख रूपये दिए थे . अब मनरेगा के ३.६२ लाख रूपये भी इसी पर खर्च हुए पर पानी के लिए महीनो से मानसून का इंतजार हो रहा है . ग्राम प्रधान  का कहना है की पानी भरने का इंतजाम मनरेगा में है ही नहीं . 
         वाराणसी जिले में भी ५७६ आदर्श तालाब खुदे है मुख्य विकास अधिकारी  शरद कुमार सिंह का दावा है कि तालाबो में पानी के लिए नाहर के किनारे २७ तथा नलकूप के किनारे १६४ तालाबो में पानी है. परन्तु बसानी कि  ग्राम प्रधान रेखा पटेल  कहती है कि पानी भरने का बजट ही नहीं है . 
 झाँसी जिले के मोठ ब्लाक में पाच तालाब दो साल बाद भी सूखे है . किसानो का कहना है कि जिस उम्मीद से उन्होंने जमीन दी उस पर पानी फिर गया मचली पालन का सपना तो सपना ही रहा गया .मनरेगा के तहत काम देने कि आनिवार्यता के चलते जिले के ज्यद्यातर इलाको में सडको पर लेप लगाकर खानापूर्ति कि जा रही है .
     
                                                                                           लेखक - विश्व वैभव शर्मा 
                                                                                       साभार- अमर उजाला ,  न्यू डेल्ही