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शनिवार, 7 मई 2011

इसलिए पल्ला झाड़ता है पाकिस्तान...!


                                  इसलिए पल्ला झाड़ता है पाकिस्तान...!
  


कोताही करे कोई, पर इतना भी काफूर ना हो/खुदगर्जी के हाथों, इतना भी मजबूर ना हो जितना कि आज पाकिस्तान है. फ्रांस में सरफ़रोश होते प्रधानमन्त्री गिलानी हों या इस्लामाबाद में मीडिया से रूबरू होते विदेश सचिव सलमान बशीर. चेहरे उड़े हैं. आखों के अक्स चेहरे के भावों से मेल नहीं खाते. थोड़ी सी बेवफाई फिल्म के एक गीत का वो शे'र शायद इसी सीन के लिए लिखा गया हो-कौन ढूंढे सवाल दर्दों के,लोग तो बस सवाल करते हैं. सवाल समस्या हो गए हैं.शक्लें दोनों की देखी नहीं जातीं.ओसामा दुश्मन दोनों का था. मारा भी दोनों ने मिल के होगा. घर के भेदी के बिना तो भगवान राम भी रावण को नहीं मार पाए थे.पर पाकिस्तान है कि मानने को तैयार नहीं है.मान लेता तो नाम नेकी मिलती. अब बदनामी ज्यादा है. पढ़िए, पाकिस्तान के विदेश सचिव ने प्रेस कांफ्रेंस में क्या क्या कहा.


उन्होनें कहा, पूछे बताये बिना अमेरिकी हेलीकाप्टरों का यूं आना-जाना पाकिस्तानी संप्रभुता का हनन नहीं था. इसलिए कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ने को सेक्योरिटी काउन्सिल ने बोला है.अमेरिकी हेलीकाप्टर इसलिए पाकिस्तानी राडार की पकड़ में नहीं आए क्योंकि वो बहुत नीची उड़ान भरे हुए थे (वे कहते कहते रह गए कि उनके राडारों को जाम कर दिया गया था). नहीं मालूम कि कुल कितने हेलीकाप्टर थे. पता तब चला जब एक गिरा. गिरा तो पहले ये पता लगाया गया कि कहीं कोई अपना ही तो नहीं गिरा है (ये पता होने के बावजूद कि पाकिस्तान के हेलीकाप्टर रात में उड़ा नहीं करते हैं. ये पता लगने में भी दस मिनट लग गए. इस के बाद नौसेना प्रमुख ने थल सेना प्रमुख कियानी को फ़ोन किया. बशीर मानते हैं कि इस फोन के मिलने में भी कुछ वक्त लगा क्योंकि फोन भी वो इस्तेमाल किया जाना था जो कहीं टेप शेप न होता हो. इसके बाद फ़ौज को आगाह किया गया. फिर कुछ देर फ़ौज को भी लग ही गयी एक्शन लेने में. इतनी देर में अमेरिकी हेलीकाप्टर अपना काम कर के जा चुके थे. बशीर साहब फरमाते हैं ये भी अच्छा ही हुआ (वर्ना फ़ालतू में अमरीकियों के साथ पंगा हो गया होता).

और जब उनसे पूछा गया कि क्या कोई और भी ऐसा कर के जा सकता है?...तो वे सकुचाये, सठियाये और फिर गुर्राए- नहीं,किसी ने ऐसा कभी सोचा भी तो मुंह की खाएगा. ज़ाहिर है ये सवाल भारतीय सेना प्रमुख के उस जवाब से से निकला था, जिसमें उन्होंने कह दिया था कि कभी करना पड़े तो भारतीय सेना भी ऐसा कर पाने में सक्षम है. उनका मकसद ये बिलकुल नहीं था कि अमेरिका ने अपने दुश्मन को पाकिस्तान की सरज़मीं पे मारने के लिए ऐसा किया है तो भारत भी करेगा या कर सकता है.वो तो किसी ने सवाल पूछा कि क्या वैसी दक्षता भारतीय सेना की भी है तो जनरल ने बोल दिया कि हाँ, है.

लेकिन बशीर साहब फ़ैल गए. सारे कूटनीतिक तकाजों (मर्यादाओं) को ताक पे रख एक अफसर ने सियासत शुरू कर दी. विदेशी प्रधानमन्त्री (डा. मनमोहन सिंह) का बाकायदा नाम लेकर इलज़ाम लगाया कि वे और उनके अफसर भारत के अपने मसलों से ध्यान हटाने की खातिर इस तरह के बयान दे रहे हैं. लगे हाथ बशीर ने ताज पे हुए हमले के लिए भारतीय ख़ुफ़िया तंत्र की असफलता भी गिना दी और ये नसीहत भी दे डाली कि 'रा' अपनी हरकतों से बाज़ आए. चलिए खैर ओसामा तो मर के समुद्री जीवों का ग्रास बन गया लेकिन आइए अब ज़रा इस सब में पाकिस्तान की हुई फ़जीहत का सबब भी समझ लें. समझें कि क्यों पाकिस्तान किस सच को छुपाने के लिए झूठ पे झूठ बोल और फिर पशेमान भी हो रहा है.

इस को सिलसिलेवार समझना पड़ेगा. नंबर एक- जब किसी छोटे से गाँव में बसा कोई छोटा मोटा चोर उचक्का भी गाँव वालों की मदद के बिना पुलिस वालों के काबू नहीं आता, डकैत हमेशा मुखबिरों ने पकड़वाए या मरवाए हैं तो क्या ये मुमकिन है कि अमेरिका ने अकेले अपने दम पे उसे दूरबीन से देखा, न सोचा न समझा, न नीचे ज़मीन पे उसके आसपास उसकी ताकत का अंदाजा लगाया और सीधे अपने कमांडो उतार दिए उसकी छत पे? कामनसेंस कहती है कि कमांडो आपरेशन से पहले नीचे के इलाके को 'सेनेटाईज़' (औरों से खाली) ज़रूर किया गया होगा. नीचे स्थिति क्या है, अन्दर कितने लोग हो सकते हैं और असलहा कितना है इसका भी कोई ज़मीनी आकलन ज़रूर हुआ होना चाहिए. ये नीचे, उस घर के आसपास कुछ अपने लोगों के अलावा हो नहीं सकता. ये अपने लोग अमरीकी से दीखते तो नहीं हो सकते थे. आसपास कोई तो लोकल इंटेलिजेंस रही होगी. भले ही वो आईएसआई न हो.

दूसरी बात- क्या कोई मूरख भी मानेगा कि कोई फौजी हेलीकाप्टर आये धड़धड़ाते हुए. वहां छत पे कमांडों की लैंडिंग भी हो, लड़ाई और गोलीबारी भी और वे कुछ लाशों जैसी पैकिंग करें, लोडिंग भी और बड़े आराम से उड़ते बनें. वे चले भी जाएँ पाकिस्तान की सीमा पार कर के और फिर अमरीका का राष्ट्रपति पाकिस्तान के राष्ट्रपति को सोते से उठा कर फोन करे, बताये कि मेरे बन्दे तुम्हारे मुल्क में जाकर ये कारनामा कर आए हैं. यानी पाकिस्तान के राष्ट्रपति को पता अपनी फौज नहीं, अमरीका के फोन से चले? ...तीसरा- अमरीकी कमांडों सच में ही पाकिस्तान को पूछे बताए बिना आते, ऐब्ताबाद पंहुचने से पहले या आपरेशन के दौरान पाकिस्तानी फ़ौज के हाथों ओसामा समेत या उसके बिना मारे जाते तो सोचो साल भर बाद फिर चुनाव की दहलीज़ पे खड़े ओबामा का खुद अमेरिका में क्या हाल होता? इतने कच्चे तो ओबामा और उनके सलाहकार नहीं हो सकते कि ओसामा को मारने के बदले अपने बन्दे मरवा के आ जाएँ. उस हालत में तो पाकिस्तान की ये दलील भी कोई नहीं मानता कि आतंकवाद के खात्मे के लिए ये आपरेशन हुआ तो वो पाकिस्तान पे हमला नहीं है.

...तो जो हुआ वो मिल के न सही मिलीभगत से तो हुआ. सवाल ये है कि जब हुआ और दुश्मन वो पाकिस्तान का भी था तो ये क्यों कह रहे हो कि हमें कुछ नहीं पता..! ये 'हमें कुछ नहीं पता' भी आप इस लिए नहीं कह रहे कि आप को सच में कुछ नहीं पता. ऐसा भी नहीं है कि आप ओबामा को सारा क्रेडिट ले लेने देना चाहते हैं ताकि उनसे मिलने वाली अरबों रूपये की सहायता के बदले आप उन्हें अगले साल के राष्ट्रपति चुनाव में और मज़बूत उम्मीदवार हो जाने दें. इसलिए भी कि अगले साल कोई रिपब्लिकन जीत गया तो आपका बैंड बज जाएगा. आपको कुछ पता दरअसल इस लिए नहीं है कि अपनी इंटेलिजेंस या फ़ौज को आप खुद भी इस पूरे आपरेशन में कहीं इस्तेमाल नहीं करना चाहते थे. और वो इस लिए कि अमेरिका की तरह आप को खुद भी अपनी आईएसआई और फौज पे भरोसा नहीं था. डर था कि पाकिस्तानी फौज और आईएसआई को कहीं भनक भी लगी तो ओसामा का मरना तो नहीं, हाँ मगर बचना यकीनी हो जाएगा.

आज भी आपको डर ये है कि खुद अपनी ही सेना और आईएसआई में तालिबान के हमदर्दों में दर्द का दरिया बह सकता है. फोटो दिखाने न दिखाने के पीछे भी आशंका हिंसा की नहीं, डर दरअसल पाकिस्तान में बगावत का है. और इस के साथ जुडा है, पापी पेट का सवाल. सच तो ये है कि आतंकवाद न होता तो उस से निबटने के नाम पर अरबों रूपये की अमरीकी मदद न होती. इस मायने में पहले आपको ओसामा सूट करता था अब उसके वारिस करेंगे. आप उन्हें ये समझाना चाहते हो कि भाई तुम बेफिक्र रहो. तुम रहोगे तो पाकिस्तान को अमरीकी मदद रहेगी. इस लिहाज़ से ओसामा ही मारा है सिर्फ. अल कायदा और उसका आतंकवाद ज़िंदा है.

                                                                                                                 विश्व वैभव शर्मा
                                                                                                                   सेफ सोसाइटी  

गोरखपुर में फैक्‍ट्री मालिकों के पक्ष में खड़े दिख रहे हैं अखबार


                    गोरखपुर में फैक्‍ट्री मालिकों के पक्ष में खड़े दिख रहे हैं अखबार
 

 इसी महीने एक तारिख को मजदूर मांग पत्रक के नाम पर दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बड़ी रैली हुई थी। जिसमें छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, पंजाब और दिल्ली से मजदूरों का एक बड़ा वर्ग दिल्ली आया था। इनमें सबसे बड़ी संख्या थी, गोरखपुर से आने वाले मजदूरों की। वे संख्या में लगभग दो हजार थे। यह भी उस वक्त हुआ, जबकि उनकी फैक्ट्री का प्रबंधन बिल्कुल यह नहीं चाहता था कि वे लोग दिल्ली आएं। मजदूर दिवस के एक सौ पच्चीसवें साल पर दिल्ली के जंतर मंतर पर इकट्ठे हुए इस मजदूर आंदोलन की खास बात यही थी कि किसी राजनीतिक या गैर-राजनीतिक दल के पास इसका नेतृत्व नहीं था। इस जुटान के संयोजकों ने बताया था कि इस आंदोलन में कई धारा के लोगों की भागीदारी है। वास्तव में इसे देश भर के मजदूरों के सांझा और एकजुट लड़ाई के तौर पर आगे बढ़ाने के प्रयास के तौर पर देखा जा सकता है।


मांग पत्रक आंदोलन में आए दूसरे प्रांतों के साथियों ने अब तक अपनी नई जिन्दगी शुरू कर दी होगी। वही रोज सुबह उठना फैक्ट्री जाना और देर शाम वापस आना। लेकिन गोरखपुर के विनोद सिंह, विरेन्द्र यादव, अमित कुमार, रमानन्द साहनी, शैलेष कुमार, पप्पू जायसवाल, रामजन्म भारत, विनय श्रीवास्तव, देवेंद्र यादव, विनोद दुबे, ध्रुव सिंह, श्रीनिवास चौहान, जैसे एक दर्जन से अधिक मजदूरों को पता ही नहीं था कि मांग पत्रक आंदोलन का साथ देना उनके लिए इतना खतरनाक हो सकता है। ये सभी साथी गोरखपुर जिला अस्पताल में जीवन मौत से जूझ रहे हैं।

यहां यदि गोरखपुर के अखबार की भूमिका की बात करें तो वह मालिकों के साथ ही चालाकी के साथ अपनी पक्षधरता दिखा रहा है। चूंकि अखबारों के सारे विज्ञापन उन्हीं की तरफ से आते हैं। फिर मजदूरों का पक्ष लेकर वह अपने व्यवसाय में नुकसान क्यों उठाएगा। शहर भर में बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा इस घटना की घोर भर्त्सना की गई लेकिन किसी भी अखबार में यह खबर नहीं छपी। खबर सिर्फ घटना परक थी। जबकि इतनी बड़ी संख्या में मजदूरों पर जानलेवा हमला होना किसी भी समाज के लिए शर्मनाक है।

बताया जा रहा है, इस सबके पीछे मजदूरों बढ़ती एकता को कमजोर करने का प्रयास है। वास्तव में गोरखपुर के लगभग सवा दो सौ फैक्टरियों में काम करने वाले कई हजार मजदूर अगर एक हो गए तो काम के घंटे आठ, जबरन ओवर टाइम बंदी, न्यूतम मजदूरी ग्यारह हजार रुपए, ठेका प्रथा बंदी जैसी तमाम मांगे मालिकों को माननी पड़ेगी। जो वे कभी नहीं चाहेंगे। इस वक्त जिन अखबारों को मजदूरों के पक्ष में होना चाहिए, वे फैक्ट्री मालिको के पास विज्ञापन के जुगाड़ में लगे हैं। इस तरह की स्थिति पर क्या कहा जा सकता है?

                                                                                                               विश्व वैभव शर्मा 
                                                                                                                सेफ  सोसाइटी  

ये हैं चैनल चलाने के आधारभूत नियम एवं दिशा निर्देश


                                 ये हैं चैनल चलाने के आधारभूत नियम एवं दिशा निर्देश 
 
: ढिबरी चैनल का घोषणा पत्र - भाग 5 : जैसा कि पहले बताया गया है कि हमने अपने पूज्य पिता जी ढिबरी लाल के नाम को रोशन करने के लिये ढिबरी चैनल खोलने की योजना बनायी है। इस चैनल को शुरू करने के लिये हमने अपनी अंटी से एक ढेला लगाये बगैर ही करोड़ों रुपयों का इंतजाम कर लिया। जब यह तय हो गया कि ढिबरी चैनल शुरू करने और चलाने में पैसे की कोई नहीं आयेगी, बल्कि छप्पर फाड़ कर पैसों की बरसात होगी, तब हमने चैनल चलाने के संबंध में कुछ नियम बनाये ताकि भविष्‍य में इसमें काम करने वाले लोगों को दिशा-निर्देश मिलता रहे।

ये नियम बहुत काम के हैं और चैनल चला रहे अथवा चैनल शुरू करने के बारे में सोच रहे लोगों के लिये अत्यंत उपयोगी हैं। अगर वे चाहें तो इन नियमों को अपने यहां लागू कर सकते हैं। ये नियम इस प्रकार हैं -

1. ढिबरी चैनल की इमारत बनाने का ठेका मेरे ताऊजी के लड़के को ही दिया जायेगा, अगर ऐसा नहीं किया गया तो पिताजी की आत्मा को कष्‍ट होगा। अगर सूचना और प्रसारण मंत्री इस बात पर अड़ गये कि इमारत बनाने का ठेका उनके साले को दिया जाये तब भी सीमेंट, सरिया और टाइल्स जैसी भवन निर्माण की सारी सामग्रियां मेरे ताऊजी के बेटे की दुकान से ही मंगानी होगी।

2. अगर हमारे परिवार में कोई शादी-विवाह अथवा अथवा अन्य पारिवारिक आयोजन हों तो चैनल के विभिन्न विभागों के इंचार्ज एवं रिपोर्टरों को निमंत्रण कार्ड बांटने होंगे। अगर कोई भी कार्ड बंटने से रह जाने या किसी के कार्ड को किसी और के यहां पहुंच जाने जैसी गलतियों को माफ नहीं किया जायेगा और दोषी की सैलरी काट ली जायेगी या उसे नौकरी से निकाल दिया जायेगा।

3. चैनल में काम करने वाली महिला पत्रकारों को बारी-बारी से हमारी दुकानों और शो रूम में काम करना होगा। अगर जरूरत पड़े तो हमारी कंपनी की ओर से बनाये जाने वाले सामान को बेचने के लिये मार्केटिंग भी करनी होगी।

4. ढिबरी चैनल में योग्यता एवं काबिलियत से वेतन तय होगा। इसका फामूर्ला यहां दिया जा रहा है ताकि किसी तरह के विवाद की गुंजाइश नहीं रहे। अगर कोई व्यक्ति हमारे चैनल में मुफ्त में काम करने वाले 100 लड़के-लड़कियों का जुगाड़ कर लेता है तब उसके मासिक वेतन-भत्ते पांच लाख रुपये होंगे। अगर कोई व्यक्ति दो-दो हजार रूपये के मासिक मेहनताने पर 100 लड़के-लड़कियों को लाता है तब उसका वेतन पहले वाले से आधा हो जायेगा। अगर किसी व्यक्ति के लाये हुये कुछ लड़के-लड़की कहीं और चले जाते हैं तो इसकी प्रतिपूर्ति पांच दिन के भीतर हो जानी चाहिये अन्यथा वेतन काट लिया जायेगा।

5. सभी पत्रकारों एवं प्रोड्यूसरों को अपने के वेतन के हिसाब से विज्ञापन लाना होगा। जिसका जितना वेतन होगा उससे कम से कम पांच गुना विज्ञापन हर माह लाना होगा। अगर कोई किसी महीने कम विज्ञापन लाता है तो दूसरे महीने अधिक विज्ञापन लाने होंगे अन्यथा कंपनी को होने वाले नुकसान का पांच गुना पैसा उसके वेतन से काट लिया जायेगा।

6. हमें चुगलीखोर लोग विशेष तौर पर पसंद हैं। सभी प्रोड्यूसरों, रिपोर्टरों एवं एंकरों को चुगलीखोरी में माहिर होना होगा और मेरे पास आकर दफ्तर में काम करने वाले लोगों की चुगली करनी होगी। खबर या दफ्तर के काम के बारे में विचार करने के लिये अगर कोई मेरे पास नहीं आये तब मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी, लेकिन अगर कोई चुगलीखोरी एवं जी हुजूरी के लिये अगर हमारे पास नहीं आया तो उसे क्षमा नहीं किया जायेगा। जो जितनी अच्छी चुगली एवं जी हुजूरी करेगा उसे उतनी जल्दी सैलरी हाइक होगी और उसके चैनल प्रमुख बनने की संभावना उतनी ही अधिक होगी। चुगली सुनने के लिये हम रात एक बजे भी उपलब्ध होंगे।

7. चैनल में काम करने वाले किसी को भी और कभी भी हमारे घर पर काम करने के लिये बुलाया जा सकता है। घर में काम करने के लिये आते समय जो पत्रकार अपने पैसे से फल-सब्जी, मिठाइयां और दाल-चावल लेते आयेंगे उन्हें पदोन्नति देने के मामले में वरीयता दी जायेगी।

8. जैसा कि पहले बताया गया है हम अपने पिता ढिबरी लाल का नाम अमर करने के लिये ढिबरी चैनल नामक फर्म शुरू कर रहें है, इस लिये हमारे परम लक्ष्य को साकार करने की कोशिश चैनल में काम करने वाले हर व्यक्ति को करनी होगी।

9. हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी हमारे पिताजी का नाम इज्जत से लें। चूंकि हमारे पिताजी की कोई इज्जत रही नहीं, ऐसे में हम अपने चैनल के जरिये हर इज्जतदार और ईमानदार व्यक्ति की इज्जत उतारने का काम करेंगे ताकि कोई अन्य अपने पास इज्जत और ईमान होने का दावा नहीं कर सके। ऐसे में लोगों को मजबूरी में हमारे पिताजी को सबसे ज्यादा इज्जतदार एवं ईमानदार मानना होगा। इसके लिये जरूरत पड़े तो स्टिंग आपरेशन, फर्जी सीडी, एमएमएस जैसे उपायों का सहारा लिया जा सकता है। मिसाल के तौर पर जैसे ही कोई ईमानदार बनने की कोशिश करे उसकी तत्काल फर्जी सीडी बनाकर मार्केट में उतार दिया जाये और सीडी को दिन रात ढिबरी चैनल पर दिखाया जाये।

10. हालांकि हमारा चैनल खबरिया चैनल है, लेकिन हमारे चैनल पर खबरें नहीं होंगी। खबरों का इस्तेमाल फिलर के तौर पर होगा। अंधविश्‍वास और जादू-टोने, नाग-नागिन, भूतहा हवेलियों, पुनर्जन्म, योगियों-भोगियो-बाबाओं आदि पर विशेष लाइव कार्यक्रमों को प्रसारित करने के बाद अगर कुछेक मिनट का समय बच जाये तो एकाध खबरें दी जा सकती है ताकि हमें न्यूज चैनल के नाम पर सरकार से मिलने वाली सुविधायें, रियायतें और बेल आउट पैकेज आदि जारी रहे।

11. अगर देश या विदेश में किसी मंत्री, उ़द्योगपति, करोड़पति, क्रिकेट खिलाडी या फिल्म स्टार आदि के परिवार में शादी-विवाह या तलाक आदि के आयोजन होते हैं तब उसका ढिबरी चैनल पर नॉन स्टाप दिन रात प्रसारण होगा। जो रिपोर्टर शादी के बाद होने वाले दुल्हा-दुल्हन के बेड रूम कार्यक्रमों का सीधा प्रसारण करने का इंतजाम कर लेगा उसे उसी समय चैनल प्रमुख बना दिया जायेगा और उसकी सैलरी दोगुनी कर दी जायेगी। अगर किसी बड़े आदमी या किसी सेलिब्रिटी के यहां शादी या तलाक के आयोजन नहीं हो रहे हैं तो उन्य लोगों के यहां होने वाले पत्नियों के हाथों पतियों की पिटाई, किसी व्यक्ति की बीबी और मासूका के बीच होने वाले सिर फुटौव्वल, किसी घर की लड़की के एमएमएस, नौकरानी के साथ छेड़खानी आदि का प्रसारण किया जा सकता है।

(जारी)

ढिबरी चैनल का घोषणापत्र

दारू-जुए का अड्डा, जो कहलाता प्रेस क्लब

मीडिया कालेज से बनिये अरबपति

जो बड़े से बड़ा पत्रकार नहीं कर सकता, ये लड़कियां झट से कर सकती हैं

लेखक विनोद विप्लव पत्रकार, कहानीकार एवं व्यंग्यकार हैं। वह संवाद समिति ''यूनीवार्ता'' में विशेष संवाददाता हैं। समाजिक विषयों के अलावा विज्ञान, स्वास्थ्य एवं सिनेमा जैसे विषयों पर वह लिखते रहते हैं। मीडिया पर लिखी गयी उनकी व्यंग्य रचनायें एवं कहानियां पुस्तक के रूप में ''ढिबरी चैनल'' के नाम से प्रकाशित होने वाली है। इस व्यंग्य के बारे में अथवा शीघ्र प्रकाषित पुस्तक ''ढिबरी चैनल'' के बारे में अधिक जानकारी के लिये ईमेल vinodviplav@gmail.com या मोबाइल नम्‍बर 9013074414 के जरिये संपर्क कर सकते हैं।

                                                         

''1700 करोड़ में टीम खरीदने वाले किसी और तरीके से निकालते होंगे पैसा''


                    ''1700 करोड़ में टीम खरीदने वाले किसी और तरीके से निकालते होंगे पैसा''  

 
   : सीएनईबी पर आज 8 बजे 'जनता मांगे जवाब' : 'क्रिकेट में गिरावट तो काफी आई है, पर जब तक खिलाड़ियों में परफारमेंस दिख रहा है तब तक सबकुछ ठीक है, गड़बड़ तो तब शुरू होगी जिस दिन यह लगने लगेगा कि सचिन तेंदुलकर का बल्ला पता नहीं किस के लिए उठ रहा है। जब तक वो स्थिति नहीं आती तब तक सबकुछ बर्दाश्त किया जाता रहेगा।' ये बातें वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन ने सीएनईबी के शो 'जनता मांगे जवाब' में कही। इस शो में पत्रकार अरविंद मोहन समेत पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी अतुल वासन, मिस दिल्ली का खिताब जीतनेवाली दिव्या और टेनिस खिलाड़ी अंकिता ने शिरकत की।

पूर्व क्रिकेटर अतुल वासन ने कहा कि पहले खिलाड़ियों का पहला मकसद देश को जिताना होता था, पैसा कमाना पहले मकसद नहीं था। आज पैसा ऊपर आ गया है। खिलाड़ी चालाक और सेल्फिस हो गए हैं। क्रिकेटर आज अरबपति बन चुके हैं। साल में उन्हें एक-दो करोड़ मिल जाते हैं। वे आज ग्लैमर ब्‍वॉय बन गए हैं। हरेक के पास फरारी है। विज्ञापनों में भी आज सिर्फ बड़े खिलाड़ियों का ही नाम इस्तेमाल किया जाता है। आज 1700 करोड़ में एक टीम खरीदी जाती है। जो निवेशक पैसा लगा रहा है वह अपना पैसा निकालना चाहता है। हिसाब लगाने पर तो लगता है कि इतने पैसे में टीम खरीदना घाटे का सौदा है। निवेशक निश्चित ही अपनी पूंजी कहीं और से किसी और तरीके से निकालते होंगे, पर पता नहीं कैसे। अतुल ने कहा कि क्रकेट आज कैश काउ बन गया है। रणजी के मैच में कोई दर्शक नहीं जाता और आईपीएल मैच के टिकट ही नहीं मिल पाते।

अतुल ने कहा कि खेलों में राजनेताओं की जरूरत है। अतुल ने कहा कि क्रिकेट ने राजनेताओं को अच्छा मंच दिया है। राजनेता आज क्रिकेट पर प्रतिक्रियाएं और इंटरव्यू देते रहते हैं। इससे उनकी इमेज बन रही है। और जगह पहचान बने न बने क्रिकेट में आकर जरूर बन जाती है। राजनेता चयन बोर्ड में आना चाहते हैं। राजनेताओं की वजह से कोई गलत खिलाड़ी टीम में आ जाता हो ऐसा नहीं है, प्रतिभा होगी तो कहीं का भी खिलाड़ी टीम में आ जाएगा।

टेनिस खिलाड़ी अंकिता ने कहा कि देशप्रेम को पहली प्राथमिकता दी जानी चाहिए। आज क्रिकेट को आगे लाकर बाकी खेलों को पीछे छोड़ दिया गया है। क्रिकेट को इतना आगे कर दिया गया है कि बाकी खेलों के लिए कोई जगह ही नहीं बची। सारे प्रोमोटर क्रिकेट को ही आगे बढ़ाने में लगे हैं। इससे बाकी खेल पीछे चले गए हैं। बाकी खेलों को भी प्रायोजक मिलने चाहिए। ये तो इस हाथ दे उस हाथ ले का मामला है। अंकिता ने कहा कि आज सारा फोकस क्रिकेट पर ही है।

मिस दिल्ली का खिताब जीतनेवाली दिव्या ने कहा कि क्रिकेट आज एक फिनिश प्रोडक्ट बन गया है और दर्शकों को आकर्षित करने के लिए इसमें गलैमर वगैरह का इस्तेमाल हो रहा है। चीयर लीडर्स जब हर चौकों-छक्कों पर नाचती हैं तो बुरा नहीं लगता। ग्लैमर की वजह से एसे लोग भी क्रिकेट मैच देखने चले जाते हैं जिनका क्रिकेट से कोई वास्ता नहीं होता। वे तो मॉडलों और स्टार्स को ही देखने जाते हैं। सीएनईबी के इस शो का प्रसारण 7 मई शनिवार को रात 8 बजे और रविवार की सुबह 11 बजे होगा।

                                                                                                        साभार बढ़स ४ मीडिया ...

Murder of Niyamat Ansari: The Facts*

 Murder of Niyamat Ansari : The Facts*


      Niyamat Ansari was a resident of Kope Gram Panchayat in Manika Block, Latehar District. During the last few years, he was working with Gram Swaraj Abhiyan, a local campaign for village self-rule, also involved in issues such as the right to information, the right to food and the right to work.
Since NREGA was launched in 2006, Niyamat Ansari and his close friend Bhukhan Singh (also from Kope Gram Panchayat) have been working for the rights of NREGA workers in the area. This included helping labourers to file work applications. From 2007 till February 2009, they supported a demand for unemployment allowance for several workers in Kope Panchayat. Their efforts bore fruit when in the Latehar Lok Adalat in February 2009, more than 90 workers were paid unemployment allowance for the first time in Jharkhand.
Their fight against corruption in NREGA made them very unpopular in the eyes of local vested interests especially private contractors (who are still in control of many NREGA works in large parts of Jharkhand). In October 2008, they were attacked in their village and hid in a pile of wood to save their lives. In February 2009, immediately after the Lok Adalat, false cases were slapped against them.
Residents of Kope Gram Panchayat were attacked by goons in March 2009. Several people were brutally beaten, including some women.
In October 2010, Bhukhan and Niyamat's homes were locked up and other residents of the village were warned against helping them. Bhukhan and Niyamat clearly identified Shankar Dubey (a notorious local contractor) as the person behind this attack on them as well as behind the earlier attempt on their lives, in October 2008.
In February 2011, Niyamat Ansari and others exposed a Rs. 2.5 lakh scam in NREGA in Rankikalan Gram Panchayat. Kailash Sahu, former BDO of Manika Block and Basudev Nagesia (Panchayat Sewak of Rankikalan) played a key role in this scam. Babloo Dubey, son of above-mentioned Shankar Dubey, was also suspected of being involved in the scam. After an enquiry, an FIR was lodged against the BDO and Panchayat Sewak on 1 March 2011.
On 2 March, 2011 a group of armed men in uniforms abducted Niyamat from his residence in Jerua village (Kope Gram Panchayat). He was brutally beaten for nearly one hour. According to eye witnesses, this was done by the same people as in October 2008. It is strongly suspected that these men were instigated by Shankar Dubey and his associates. After they deserted him, Niyamat's brother and other family members carried his unconscious body on a charpoy from Jerua village to Manika thana, a distance of about 10km. Niyamat's family reached Manika thana on foot, with Niyamat unconscious on a charpoy, before the administration managed to send an ambulance to them. After this, Niyamat was brought to Latehar Sadar Hospital. Soon after reaching there, he died. Despite being alerted to the danger to their lives, the district and state administration failed to save his life.
Bhukhan Singh was also being sought out, but he was able to save his life by hiding. On the morning of 3 March, 2011 he was brought to Latehar by the district authorities.
On 3 March, 2011, an FIR was lodged in Latehar against eight persons believed to be responsible for Niyamat Ansari's murder. Those named in the FIR are Sudarshan, Shankar Dubey, Vijay Dubey, Purushottam Prashad, Arun Singh, Vashisht Tiwari, Prem Chand Singh and Devas Singh. The Superintendent of Police (SP) Latehar promised to arrest them all without delay.
Sudarshan, named in the FIR, is known as the local Maoist "commander". The other persons named in the FIR, starting with Shankar Dubey, are mainly local contractors or their associates. Some of them, including Shankar Dubey and Arun Singh, have political party affiliations and are believed to enjoy the protection and patronage of local politicians or former politicians.
On 5 March, 2011, local newspapers including Prabhat Khabar and Dainik Bhaskar published a statement (No. 25, available on request) by the South Latehar Sub-zonal Committee of CPI (Maoist) claiming responsibility for the murder. Their main complaint against Niyamat in that statement is that he had failed to appear in a "jan adalat" they had convened to resolve a local dispute about forest land, and turned police informer. In the same statement, they warned Bhukhan Singh that if he remained under police protection and failed to come to a jan adalat, he would meet the same fate. This statement ends by absolving the others named in the FIR of the crime.
On 6 March, 2011, a joint delegation of the People's Union for Civil Liberties (PUCL) and United Milli Forum (UMF) visited the area and conducted a thorough enquiry. This enquiry confirmed the above-mentioned series of events. Their report is awaited.
On 7 March, the Indian Express carried an inaccurate and insidious article claiming that the DC and SP of Latehar had sent a report to the Ministry of Rural Development stating that Niyamat had cases of "attempt to murder" against him and had been responsible for the burning of Adivasi huts. There are no such cases against Niyamat, nor did the DC and SP claim this in their report. The following day the Indian Express carried an apology for the same (a personal apology was also received by email from the concerned reporter).
At the time of writing (9 March 2011), only one of those named in the FIR (Arun Singh) has been arrested.

*This note is based on detailed enquiries conducted by Jean Drèze, James Herenj and Reetika Khera and also draws on the findings of the PUCL Fact Finding team on 6 March, 2011. Some details may require further corroboration, but the main points are well established.