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शनिवार, 25 दिसंबर 2010

Sugarcane Vs Medicine

गन्ने पर घाटा , दवा पर सात सौ टका मुनाफा 
                 फसल बोए तो लागत भी नहीं निकलती ,यदि फैक्ट्री लगा ले तो हजारो गुने का लाभ मिलेगा : मानवीय जीवन का दो तत्वों से सर्वाधिक सवेंदनसिल रिश्ता है  , दवा और चीनी . मूल तत्व हवा, पानी प्रक्रति ने प्रदान किये है . उसके बाद की प्राथमिक अवास्यक्ताओ में नमक है  जिस पर महात्मा गाँधी जन- आन्दोलन चला चुके है .डॉ राम मनोहर लोहिया ने भी अर्थ शास्त्र  की PHD " नमक सत्याग्रह " पर ही की थी. इतना कह सकता हू की नमक  के बाद अगला जन- अनंदोलन चीनी व् दवा को लेकर ही चलेगा. गन्ना किसान मुसीबत में है परन्तु चीनी के दम बढ़ रहे है जिसका लाभ किसान को नहीं मिल रहा है. चीनी मिलो के मुनाफे में देश के कर्णधार अघोसित पार्टनर है . किसान उस बीमार की तरह है जिससे प्रतेक को हमदर्दी है परन्तु उसकी संजीवनी का स्रोत चीनी मिल में है जहा रखी संजीवनी का स्टाक मिल मालिक , अधिकारी तथा कथित राजनेता अपने  यवन  को  बरकरार रखने के लिए कर रहे है.
                       दवा में गरीबो को कर्जे की यातनाये साथ मिलती है .असह्य व्यक्ति आपने प्रियजनों के उपचार के लिए अपना सब कुछ बेच कर दवा खरीदने को बाध्य है . वे न चीनी के बिना रह सकते है न दवा के बिना , परन्तु सरकार ने  यहाँ कभी सार्वजनिक नहीं किया की दवा व् चीनी की फैक्टरी मालिको को कितना मुनाफा मिलता है .  हम यहाँ कधापी नहीं जानना चाहते है की कार, टेलीविसन , शूट , व् टाई  के फैक्टरी मालिको को कितना मुनाफा है . ये तो हसियत व् जेब की सुबिधा के अनुसार ख़रीदे जाने वाली बस्तुए है . परन्तु चीनी घर की आम जरुरत व् दवा प्रकिर्तिक आपदा से बचने के आधार है . जब जनता को यहाँ सच्चाई मालूम पढेगी की दवा व् चीनी की दामो में हो रही लूट- पाट का भुगतान उन्हें अपना पेट काटकर करना पड़ रहा है तो नमक से बड़ा सत्याग्रह  चीनी व् दवा के दामो को लेकर होगा . देश के करन धार सावधान हो जाए . 
                        कृषी आधारित देश में क्रिसक को फसल का मूल्य न मिले , रोटी के लिए हल , फावड़ा , बर्तन धोते , घर साफ करते , छोटी मोटी नौकरी करते या फेरी लगाकर सुबह से रात तक जंग करते हुए ९० करोड लोगो को जब यह जानकारी होगी की दवा  लागत से पाच से सात सो  या हजार प्रतिसत मुनाफे पर बेचीं जा रही है तो लोग आक्रोश से भर उठेंगे . सवाल करेंगे की मिलो से चंदे में  सैकड़ो करोड़ लेकर जनता को अन्याय की जवाला में सुलगने के लिए छोड़ना देश के निति निर्धारको की नैतिक जिम्मेदारी है ? 
                      नर्सिंग होम के बेड़ से  बेटे के सहारे उठा और लाठी  के सहारे टुकुर - टुकुर चलने वाले ब्रिध के बेटे के मन में अगर यह जिज्ञासा जग जाये की दिस्चार्रज स्लिप पर लिखी जो गोली सात रूपये की है उसकी असली कीमत क्या होगी तो उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी ? निश्चित रूप से इस कीमत में दुकान का किराया , बिजली , नौकर और तमाम खर्चे सब कुछ है  परन्तु अगर वह युवक खोजी प्रविर्ती का हुआ और मेडिकल स्टोर से फैक्टरी तक पहुच कर ज्ञात कर ले की जिस गोली को उसने सात रूपये में ख़रीदा है उसकी वास्तविक  निर्माण लागत मात्र पच्चास से साठ पैसे ही आई है तो सबसे पहले कहेगा की : " सरम करो इ देश चलाने वालो " तो क्या एक बार फिर बिना गाँधी  के डंडी मार्च होगा या किसी गाँधी के आने का इंतजार होगा .  ? 
                     किसानो को अपना गन्ना जलाने  के बजाय नगाड़े बजा कर जिला मुख्यालयों पर यही सवाल पूछना चाहिए की खेत में फसल बोए तो लागत भी नहीं निकलती  , यदि फैक्टरी लगा ले तो हजारो गुने का लाभ मिलेगा , तो क्या , सरकार खेतो को कंक्रीट फिल्ड बनाना चाहती है ? जिसकी आत्मा नहीं उसके तन में क्या है ? किसान देश की आत्मा है . किसान की बर्बादी की चाह लिए हुए देश के निति निर्धारक यह जन ले की भूखे अन्नदाता  के देश में कटोरा लेकर उरोप , अमेरिका की और अन्न के दानो के लिए लगी लाइनों में सबसे आगे वे ही होंगे. 

            अतः सावधान हो जाओ नयी क्रांति आया रही है........................................................ 



                                                                              विश्व  वैभव शर्मा 
                                                                                 सेफ  सोसाइटी